भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा के समन्वय से होगा प्रकृति संरक्षण, पांच दिवसीय संकाय विकास कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने बताए पर्यावरण बचाने के उपाय

साहिल अंसारी

हापुड़। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, मेरठ प्रांत एवं आर्य कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, हापुड़ के संयुक्त तत्वावधान में पांच दिवसीय संकाय विकास कार्यक्रम (एफडीपी) का आयोजन किया गया। आभासी माध्यम से आयोजित कार्यक्रम का विषय ‘प्रकृति पूजन से प्रकृति संरक्षण तक : भारतीय ज्ञान परंपरा तथा आधुनिक शिक्षा का समन्वय’ रहा। पांच दिनों तक चले कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने भारतीय ज्ञान परंपरा, आधुनिक विज्ञान और शिक्षा के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण को प्रभावी बनाने पर विचार रखे।

कार्यक्रम के पहले दिन ‘प्रकृति एवं भारतीय चेतना’ विषय पर मुख्य वक्ता प्रो. नीलम कुमारी ने कहा कि भारतीय चेतना में प्रकृति को केवल वस्तु या संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और चेतना का अभिन्न स्वरूप माना गया है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति और दर्शन में प्रकृति के साथ मनुष्य का संबंध सदैव गहरा रहा है। अध्यक्षीय उद्बोधन में महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. साधना तोमर ने कहा कि भारतीय परंपरा प्रकृति के प्रत्येक स्वरूप के सम्मान का संदेश देती है। प्रकृति मनुष्य से अलग नहीं, बल्कि उसके जीवन का अभिन्न हिस्सा है।

दूसरे दिन ‘जल, वन और भूमि : भारतीय पारंपरिक ज्ञान में संरक्षण की वैज्ञानिक दृष्टि’ विषय पर हरेंद्र सिंह ने विचार रखे। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने के लिए ऐसी जीवनशैली और तकनीक अपनाई थीं, जो आज भी वैज्ञानिक दृष्टि से प्रासंगिक हैं। बावड़ी, जोहड़ और तालाब जैसे पारंपरिक जलस्रोत जल संरक्षण के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

तीसरे दिन डॉ. इशिता पाठक ने ‘परंपरा से तकनीक तक : सतत विकास के लिए भारतीय ज्ञान में आधुनिक विज्ञान’ विषय पर कहा कि सतत विकास के लिए भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान का समन्वय आवश्यक है। चौथे दिन प्रो. साधना तोमर ने ‘शिक्षा से पर्यावरणीय संस्कार तक’ विषय पर कहा कि शिक्षा केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं है। इसके माध्यम से विद्यार्थियों में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी, संवेदनशीलता और पर्यावरण संरक्षण की भावना विकसित की जा सकती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता एडवोकेट स्वाति गर्ग ने की।

समापन दिवस पर डॉ. राजीव अग्रवाल ने ‘ज्ञान से कर्म तक : प्रकृति संरक्षण के लिए नवाचार, तकनीक एवं सामूहिक सहभागिता’ विषय पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण के लिए ज्ञान और जागरूकता बुनियादी आवश्यकता है। पारंपरिक ज्ञान के साथ आधुनिक विज्ञान और नवाचार की महत्वपूर्ण भूमिका है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, नवीकरणीय ऊर्जा, विभिन्न एप और डिजिटल प्लेटफार्म का उपयोग भी पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को प्रभावी बना सकता है।

प्राचार्या प्रो. साधना तोमर ने पांच दिवसीय कार्यक्रम की आख्या प्रस्तुत करते हुए पर्यावरण संरक्षण के लिए सामूहिक सहभागिता को सफलता की कुंजी बताया। कार्यक्रम में डॉ. अंकित कुमार, डॉ. अनुपम तिवारी, डॉ. योगेंद्र सिंह, डॉ. प्रभात कुमार, डॉ. सर्वेश कुमारी, डॉ. नीलम कुमारी, उमेश सेनरा और गजेंद्र पुंडीर समेत अन्य वक्ताओं व प्रतिभागियों ने सहभागिता की। प्रत्येक दिन कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती की वंदना से हुआ और समापन कल्याण मंत्र के साथ किया गया।

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