दिल्ली दंगों के आरोपी शाहरुख पठान को मिली अंतरिम जमानत, मां की इद्दत रस्म में होगा शामिल/India News 24

Delhi riots 2020: कड़कड़डूमा कोर्ट ने 2020 उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगा मामले के आरोपी शाहरुख पठान को अपनी मां की इद्दत से जुड़े रस्म में शामिल होने के लिए 6 दिन की अंतरिम जमानत दी

Shahrukh Pathan Delhi riots 2020: साल 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों के मुख्य आरोपियों में से एक शाहरुख पठान को कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने मानवीय आधार पर दायर उसकी अर्जी को मंजूर करते हुए उसे छह दिन की अंतरिम जमानत दे दी है।

पठान ने अपनी मां की इद्दत की रस्मों में शामिल होने और उनकी देखभाल करने के लिए यह अस्थायी रिहाई मांगी थी। गौरतलब है कि हाल ही में पठान के पिता का निधन हो गया था और तब से उनकी मां धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार शोक और एकांत की इस खास अवधि इद्दत का पालन कर रही हैं।

पुलिस अधिकारी पर पिस्तौल तानने का आरोप
शाहरुख पठान अभी दिल्ली की हाई-सिक्योरिटी तिहाड़ जेल में बंद है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े दो अलग-अलग मामलों में कोर्ट ने उस पर आरोप तय किए हैं। इनमें से सबसे हाई-प्रोफाइल मामला वह है जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा था।

दिल्ली पुलिस के अनुसार, 24 फरवरी 2020 को जाफराबाद-मौजपुर इलाके में भड़की हिंसा के दौरान, पठान ने खुलेआम निहत्थे हेड कॉन्स्टेबल दीपक दहिया पर पिस्तौल तानी और उन्हें जान से मारने की धमकी दी। लाल टी-शर्ट पहने और पुलिस अधिकारी पर बंदूक ताने हुए पठान की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए थे, जिससे वह दंगों से जुड़े प्रमुख चेहरों में से एक बन गया।

शाहरुख पठान पर हैं क्या-क्या आरोप?
हिंसा भड़कने के बाद पठान दिल्ली से भाग गया था, लेकिन 3 मार्च 2020 को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने उसे उत्तर प्रदेश के शामली जिले से गिरफ्तार कर लिया। तब से वह हिरासत में है। कड़कड़डूमा कोर्ट में उस पर कई गंभीर अपराधों के लिए मुकदमा चल रहा है, जिनमें दंगे भड़काना और गैर-कानूनी भीड़ (दंगों) में शामिल होना, हत्या की कोशिश (धारा 307), सरकारी कर्मचारी पर हमला करना और सरकारी काम में बाधा डालना एवं रोहित शुक्ला नाम के व्यक्ति की हत्या की साजिश का आरोप शामिल है।

क्या होता है इद्दत? जिसके लिए मिली जमानत
इस्लामिक शरिया कानून के अनुसार, इद्दत एक अनिवार्य समय-सीमा होती है, जिसके दौरान पति की मौत या तलाक के बाद मुस्लिम महिला को एकांत में रहना होता है। इस दौरान महिला को किसी दूसरे पुरुष से शादी करने की इजाजत नहीं होती है।

नियमों की बात करें तो, विधवा के लिए इद्दत की अवधि पति की मौत के बाद चार महीने और दस दिन तय की गई है। हालांकि, अगर महिला गर्भवती है, तो यह अवधि बच्चे के जन्म तक बढ़ जाती है। इद्दत के दौरान महिला को बहुत सादा जीवन जीना होता है, वह सज-धज नहीं सकती, इत्र या गहनों का इस्तेमाल नहीं कर सकती और जब तक बहुत ज़रूरी न हो घर से बाहर नहीं निकलती। इस परंपरा का मुख्य धार्मिक और सामाजिक मकसद गुजर चुके पति का शोक मनाना और बच्चे के पिता के बारे में पक्का करना है।





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