26दिन बाद टूटा सोनम वांगचुक का अनशन, लद्दाख के अधिकारों की लड़ाई में सरकार से वार्ता की नई उम्मीद
साहिल अंसारी
नई दिल्ली। लद्दाख के प्रसिद्ध पर्यावरणविद्, शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने 26 दिनों तक चले अपने अनशन को समाप्त कर दिया। लेह में कठिन मौसम और शून्य से नीचे तापमान के बीच जारी इस आंदोलन ने पूरे देश का ध्यान लद्दाख के संवैधानिक अधिकारों, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों के भविष्य की ओर आकर्षित किया। वांगचुक ने अस्पताल में सूप पीकर अपना अनशन तोड़ा। उनके इस फैसले के पीछे केंद्र सरकार और विभिन्न राजनीतिक नेताओं की ओर से वार्ता और मांगों पर गंभीरता से विचार करने का आश्वासन प्रमुख कारण बताया जा रहा है।
सोनम वांगचुक का यह आंदोलन वर्ष 2019 के बाद लद्दाख की बदली राजनीतिक स्थिति से जुड़ा है। जम्मू-कश्मीर से अलग होकर केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद लद्दाख में विधानसभा नहीं है। स्थानीय संगठनों का कहना है कि इससे जनता की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी कम हुई है और क्षेत्र के विकास, पर्यावरण तथा रोजगार से जुड़े मामलों में स्थानीय लोगों की भूमिका सीमित हो गई है।
इन्हीं मुद्दों को लेकर लेह की एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के समर्थन से आंदोलन चलाया गया। आंदोलनकारियों की प्रमुख मांग है कि लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची के तहत विशेष संरक्षण दिया जाए, जिससे यहां की जनजातीय आबादी अपनी भूमि, जल, जंगल और सांस्कृतिक विरासत की बेहतर सुरक्षा कर सके। इसके अलावा लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने, लेह और कारगिल के लिए अलग-अलग संसदीय प्रतिनिधित्व तथा स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और लोक सेवा आयोग जैसी व्यवस्थाएं लागू करने की भी मांग की जा रही है।
अनशन के दौरान सोनम वांगचुक केवल पानी और नमक के सहारे रहे। कठिन परिस्थितियों में चले इस शांतिपूर्ण आंदोलन को देश के विभिन्न हिस्सों से सामाजिक संगठनों, पर्यावरण प्रेमियों और युवाओं का समर्थन मिला। आंदोलन के दौरान लद्दाख के पर्यावरण और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा का मुद्दा भी राष्ट्रीय बहस का विषय बना रहा।
अनशन समाप्त करते हुए सोनम वांगचुक ने कहा कि सरकार की ओर से उनकी मांगों पर सकारात्मक चर्चा का भरोसा मिला है। उन्होंने उम्मीद जताई कि संसद और अन्य उचित मंचों पर लद्दाख के लोगों के अधिकारों, पर्यावरण संरक्षण और विकास से जुड़े मुद्दों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि अनशन समाप्त होने का अर्थ आंदोलन का अंत नहीं है, बल्कि अब यह संघर्ष संवाद और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से आगे बढ़ेगा।
वांगचुक ने देश के युवाओं से शांति और अहिंसा के रास्ते पर चलने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से अपनी बात रखना है। उनका कहना था कि लद्दाख की नाजुक पारिस्थितिकी, ग्लेशियरों और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा केवल स्थानीय लोगों का नहीं, बल्कि पूरे देश का दायित्व है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित विकास के कारण हिमालयी क्षेत्रों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में लद्दाख जैसे संवेदनशील क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना भविष्य के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अब सभी की नजरें केंद्र सरकार और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच होने वाली आगामी वार्ताओं पर टिकी हैं। यदि मांगों पर सकारात्मक पहल होती है तो यह न केवल लद्दाख के राजनीतिक भविष्य, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय स्वशासन की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
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